शाहीनबाग : आँखों देखी, कानों सुनी 

शाहीन बाग में करीब तीन घंटे रहा। वहाँ बैठे लोगों से बात कर उनके भीतर चल रहे भावों को समझने की कोशिश की। जो महसूस किया उसे आपके सामने रख रहा हूँ –

संतोष राय, नई दिल्ली
……………. ………………… ……………. ..........
शाहीन बाग में करीब तीन घंटे रहा। वहाँ बैठे लोगों से बात कर उनके भीतर चल रहे भावों को समझने की कोशिश की। जो महसूस किया उसे आपके सामने रख रहा हूँ –
दिल्ली और नोएडा को जोड़ने वाला मुख्य मार्ग बंद है। आँदोलन स्थल के पहले जसोला शाहीन बाग मेट्रो स्टेशन है और उसके बाद कालिंदी कुंज मेट्रो स्टेशन है। अपनी अपनी सुविधानुसार दिन भर लोगों का आना जाना यहाँ लगा रहता है। बाकी लोग आते हैं और चले जाते हैं लेकिन शाहीनबाग की सैकड़ों महिलाएँ वहाँ बैठी रहती हैं। वहाँ करीब अस्सी साल की दादीयाँ हैं तो कुछ महीने के बच्चों के साथ उनकी माएँ।

 


मैंने अनुभव किया कि आंदोलन वाली जगह पर हिस्से हैं जो CAA-NRC-NPR के विरोध-स्वर के साथ जुड़े हैं। कुछ लोग मंच और मंच के आसपास बैठे हैं तो बाकी लोग मंच के सामने वाली जगह पर। मंच और मंच के आसपास रहने वाले तय करते हैं कि मंच पर किसे बोलने देना है-क्या बोलने देना है-कितना बोलने देना है। मंच के सामने बैठी दादीयाँ, माएँ एवं बहने उसमें बस हामी भरती हैं।

 

 

मंच पर भाषण देने वालों, अनुभव बाँटने वालों, कविताएं सुनाने वालों का मुख्य स्वर CAA-NRC-NPR के बहाने सरकार विरोधी ‘वीर’ रस से भरा होता है – छीन के लेंगे आजादी, मरते दम तक लड़ेंगे वगैरह वगैरह। स्वर के सरकार समर्थक होने का कोई तुक भी नहीं है। CAA सरकार लाई है तो विरोध भी सरकार के खिलाफ ही होगा। नरेंद्र मोदी, अमित शाह और बीजेपी विरोध से होते हुए संघ तक का नाम उनकी कविताओं और भाषणों के मूल में होता है। एक बात मैं फिर स्पष्ट कर दूँ कि मंच और मंच के आसपास रहने वालों और मंच के सामने बैठी माताओं-बहनों के साथ उनका न तो कोई बौद्धिक सम्बंध स्थापित हो पा रहा था, न भावनत्मक। बस जहाँ उनके कानों में CAA-NRC-NPR और सरकार विरोधी तुकबंदी आती सामने बैठे लोग ताली बजाने लगते। ये तो रहा मंच और मंच के आसपास का नजारा।
आंदोलन स्थल से सौ मीटर दूर नुक्कड़ नाटक का मंचन हो रहा था। वहाँ भी सरकार विरोधी विषय वस्तु पर मंचन जिसके मूल में था कि समाज में अराजकता फैल गई है, माहौल पूरी तरह खराब हो चुका है, सबको अब जाग जाना चाहिए, नहीं तो ये तानाशाही सरकार हमारा जीना दुश्वार कर देगी –वगैरह वगैरह। वहाँ भी शाहीनबाग की आम पब्लिक और बाहर से आने जाने वाले लोग थे।

 


तीसरा नजारा ये भी था कि कुछ बुद्धिजीवी टाइप के लोग पर्चे लेकर खड़े दिखे। लोगों को पर्चे बाँट रहे थे और खड़े लोगों को रूस से लेकर देश दुनिया की तमाम बातें बता रहे थे-हिटलकर का नाम ले ररहे थे-साम्राज्यवाद-साम्यवाद और साम्प्रदायिकता की बातें कर रहे थे- जिसका निहतार्थ यही थी कि जाग जाओ नहीं तो तुम्हारे साथ, देश के साथ बहुत बुरा होने वाला है। जाग जाओ से तात्पर्य यही था कि उठो-खड़े हो जाओ और कानून का विरोध करो। संविधान संकट में है उसे बचाने के लिए लड़ो। मंच पर भाषाओं और कविताओं के बहाने, नुक्कड़ नाटकों के जरिए, पर्चे वगैरह बाँटकर बस एक ही बात बताई जा रही थी कि हमें साम्प्रदायिक ताकतों (मोदी-शाह-बीजेपी-संघ और उनकी सरकार) से कैसे निपटना है।

कुछ बातें और ...
-------------
-आंदोलन के ‘बौद्धिक ठेकेदारों’ के अलावा बाकी किसी को भी ठीक से न तो CAA की समझ थी, न NRC की और न ही NPR की। न्यूज में क्या चल रहा है उनको नहीं पता। सरकार उनके मामले में क्या बोल रही है उनको नहीं पता, सुप्रीम कोर्ट में शाहीनबाग को लेकर क्या सुनवाई हो रही है उनको नहीं पता। हाँ, न्यूज चैलनों पर चल रही खबरों, सरकार की बातों और सुप्रीम कोर्ट के मामलों पर मंच से नए ढंग का प्रस्तुतिकरण जरूर कर दिया जा रहा था। वो प्रस्तुतिकरण भी इस तरह का कि सरकार हमारे खिलाफ काम कर रही है, सुप्रीम कोर्ट वही करेगा जो सरकार चाहेगी इसलिए न तो हमें सरकार की बात माननी है और न सुप्रीम कोर्ट की। जब तक सरकार CAA वापस नहीं लेगी हम यहाँ से नहीं हटेंगे। चाहे इसके ले हमें किसी भी तरह की कुर्बानी क्यों न देनी पड़े।

 


-बच्चे बड़े मासूम होते हैं। उनका मन बहुत भोला होता है। हम बड़े जैसा संस्कार उन्हें देंगे उनका बाल मन वैसा ही बन जाएगा। खाली जगह पर बच्चे खेल रहे थे। आजादी ... आजादी ... मुर्दाबाद ... मुर्दाबाद ...CAA-NRC, अमित शाह-नरेंद्र मोदी उनके खेल का हिस्सा बन चुके हैं। जब वे खेल रहे थे तो वे इन शब्दों का उच्चारण भी करते जा रहे थे।

 


-कुछ लोगों ने कहा सुप्रीम कोर्ट सरकार के इशारे पर काम कर रही है। सुप्रीम कोर्ट चाहती है कि हम धरना-प्रदर्शन कहीं और जाकर करें लेकिन हम जैसे ही यहाँ से हटेंगे हमारा आंदोलन फुस्स हो जाएगा। इसलिए हम यहाँ से हटने वाले नहीं हैं। हम NPR-NRC का विरोध करेंगे। हम सरकार को कोई कागज नहीं दिखाएंगे। हम NPR-NRC में शामिल ही नहीं होंगे देखें हमारा क्या कर लेते हैं।

 


मैंने अनुभव किया कि उपरोक्त जो बातें दादीयाँ-माताएं–बहने और बच्चे बोल रहे थे उनके शब्द थे ही नहीं। बार बार मंच से कविताओं-भाषणों के माध्मय से, नाटकों के माध्यम से और पर्चों के माध्यम से बार-बार एक ही बात सुनते सुनते एक कॉमन शब्दावली ही सबके पास थी। अलग से न कोई सोच, न कोई विचार। जो कहा जा रहा है उसे फॉलो करना है अंजाम चाहे कुछ भी हो।

जनसत्ता एक्सप्रेस एक स्वतंत्र मंच है। जहां आपको अपनी बात रखने की, अपने विचार रखने की, अपने जज्बात रखने की खुली छूट है। पर एक बात यहां साफ कर दें कि पत्रकारिता के भी कुछ मूलभूल सिद्धांत हैं जिससे परे हम लोग भी नहीं। पर आप जनसत्ता एक्सप्रेस के साथ किसी भी रूप में जुड़ना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। हम या आपको उतना ही आदर देंगे, सम्मान देंगे जितना अपने सहकर्मी को। इसलिए आप अपने क्षेत्र की खबरें, वीडियो हमें शेयर करें। हम उन्हें जनसत्ता एक्सप्रेस पर प्रकाशित करेंगे। इसके लिए आप jansattaexp@gmail.com का उपयोग कर सकते हैं। या फिर हमें आप whatsup भी 7678313774 पर कर सकते हैं। फोन तो आप कर ही सकते हैं। इसलिए एक नेक काम के लिए, पत्रकारिता को जिंदा रखने के लिए हमारे साथ, हमारी टीम का हिस्सा बनिए और स्वतंत्र पत्रकार, फोटोग्राफर, स्तंभकार के रूप में अपने अंदर के पत्रकार को जिंदा रखिए। हमारी टीम तो आपके साथ है ही।

राजेश राय, संपादक, जनसत्ता एक्सप्रेस

ट्रेंडिंग