बिहार में नीतीश को मात देने का मद्दा अभी किसी भी दल में नहीं

राजेश राय, नई दिल्ली। बिहार की सियासत में बदलाव की आहट भले ही सुनाई पड़ रही हो पर अभी भी यहां नीतीश कुमार को मात देने का मद्दा अभी किसी भी राजनीतिक दल में नहीं है। चाहे वह भाजपा ही

राजेश राय, नई दिल्ली। बिहार की सियासत में बदलाव की आहट भले ही सुनाई पड़ रही हो पर अभी भी यहां नीतीश कुमार को मात देने का मद्दा अभी किसी भी राजनीतिक दल में नहीं है। चाहे वह भाजपा ही क्यों न हो। भाजपा तो पहले ही  बिहार में जदयू के नीतीश कुमार को अपना बड़ा भाई मानकर नतमस्तक हो चुकी है वहीं अन्य छोटे दल पहले ही एक बार फिर नीतीशे कुमार का नारा लगा रहे हैं। कुछ मिलाकर देखा जाए तो लालटेन ही है जो कुछ जदयू को थोड़ा बहुत जला सकती है क्योंकि चिराग की रोशनी में उतना भी तपन नहीं है कि तीर का बाल भी बांका कर सके।

हालांकि सियासी गलियारे में चर्चा है कि नीतीश को पराजित करने के लिए भाजपा अंदर ही अंदर साजिश कर रही है पर उसकी साजिश कितनी धारदार है यह उस बात से ही पता चलता है कि बिहार में उसके पास कोई इस कद का नेता भी नहीं जिससे वह अपना सर्वमान्य मान सके।

नीतीश के कार्यकाल के 15 साल पर नजर डाले तो बिहार में परिवर्तन की बयार देखने को मिलती है। वह अपराधियों पर नकेल कसने से लेकर सड़क, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य पर नीतीश ने खूब काम किया है। हां एक मोर्चे पर सरकार जरूर पीछे है वह है रोजगार के मुद्दे पर। यहां रोजगार नहीं है। हालांकि जो लोग रोजगार देने की बात कर रहे हैं वह भी रोजगार देने की स्थिति में नहीं है। बिहार को पहले सुशासन का घर बनाना था उसके बाद यहां रोजगार की तलाश करनी चाहिए थी। हालांकि सभी सरकारें रोजगार के मुद्दे पर फेल हैं उसमें नीतीश कुमार भी फेल हैं। रोजगार के मुद्दे पर यहां से लोगों का पलायन हुआ है यह सच है पर नीतीश के कार्यकाल में ही ऐसा हुआ है ऐसा नहीं है। नीतीश के पहले से भी यहां से दूसरे प्रदेशों में लोग काम के लिए बिहार से कूच किए हैं। जो लोग दूसरे प्रदेशों में रोजगार को गए हैं उन्होंने अपना जीवन बेहतर किया है। इसलिए केवल रोजगार के मुद्दे पर नीतीश को घेरना बेइमानी होगी।

 

 

 

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