पापनाशक व स्वर्ग प्रदायक माघ मास

भारतीय पंचांग के अनुसार पौष महीना के पश्चात प्रारम्भ होने वाला ग्यारहवां मास माघ है। मघा नक्षत्रयुक्त पूर्णिमा से प्रारंभ होने के कारण इस मास का नाम माघ रखा गया है। नक्षत्रों पर आधारित

 

-अशोक “प्रवृद्ध”

 

 

भारतीय पंचांग के अनुसार पौष महीना के पश्चात प्रारम्भ होने वाला ग्यारहवां मास माघ है। मघा नक्षत्रयुक्त पूर्णिमा से प्रारंभ होने के कारण इस मास का नाम माघ रखा गया है। नक्षत्रों पर आधारित चंद्रमास के अनुसार वर्ष के ग्यारहवें महीने माघ का विशेष पौराणिक व लौकिक महत्व है। मान्यता के अनुसारमाघ मास में स्नान मात्र से ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है। माघ मास में ब्रह्म बेला मेंगंगाअथवा अन्य किसी पवित्र धारा में स्नान करना परम उत्तम माना जाता है। ब्रह्म मुहूर्त में जब नक्षत्र दर्शनीय रहते हैं,तारागण टिमटिमा रहे होते हैं, उस उत्तम काल में सूर्योदय के पूर्व स्नान का समय सर्वोत्तम माना गया है।अधम काल सूर्योदय के बाद स्नान करने का है। माघ मास का स्नान पौष शुक्ल एकादशी अथवापूर्णिमासे आरम्भ कर माघ शुक्ल द्वादशी या पूर्णिमा को समाप्त करना उत्तम माना गया है। कहीं- कहीं इसे संक्रान्ति से परिगणन करते हुए सूर्य के माघ मास में मकर राशि पर स्थित होने के समय उपयुक्त समय माना जाता है।पद्मपुराण के अनुसार माघ मास में पूजा करने से भी भगवान श्रीविष्णु को उतनी प्रसन्नता नहीं होती, जितनी कि माघ महीने में स्नान मात्र से होती है। इसलिए सभी पापों से मुक्ति और भगवान विष्णु की प्रीति प्राप्त करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को माघ स्नान करना चाहिए। समस्त नर-नारियों को माघ स्नान व्रत के आचरण का अधिकार बताते हुए पुराणों में कहा गया है कि सबसे महान पुण्य प्रदाता माघ स्नान गंगा, यमुना व सरस्वती के संगम स्थल का माना जाता है।पापनाशक व स्वर्ग प्रदायक माघ मास की महिमागान करते हुए पौराणिक ग्रन्थों में कहा गया है कि यद्यपि इस मास में जहां कहीं भी जल हो, वह गंगाजल के समान होता है, तथापि प्रयाग, काशी, नैमिषारण्य, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार तथा अन्य पवित्र तीर्थों और नदियों में स्नान का बड़ा महत्व है।इस काल में मन की निर्मलता एवं श्रद्धा भी आवश्यक है। माघ मास में शीतल जल के भीतर डुबकी लगाने वाले मनुष्य पाप से मुक्त होकर स्वर्ग लोक में जाते हैं।माघ मास की अमावस्या को प्रयागराज में तीनकरोड़ दस हजार अन्य तीर्थों का समागम होता है। इसलिए नियमपूर्वक व्रत का पालन करते हुए माघ मास में प्रयाग में स्नान करने से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो अंततः स्वर्ग में जाता है।

 

 

माघ मास में प्रयाग संगम तट पर कल्पवासका विशेष आध्यात्मिक व धार्मिक महत्त्व है। माघ कालमेंसंगमके तट पर निवास को कल्पवासकहते हैं। वेदादि ग्रन्थों मेंयज्ञ- यज्ञादिककर्म ही कल्पकहे गये हैं। कल्पवास शब्द का उल्लेख पौराणिक ग्रन्थों में करते हुए कहा गया है कि माघ काल में संगम के तट पर वास कल्पवास के नाम से संज्ञायित है। कल्पवास का प्रारम्भपौषशुक्लएकादशीसे होता है और माघशुक्लद्वादशीपर्यन्त एक मास तक चलता है। कुछ लोगपौष पूर्णिमासे ही कल्पवास का आरम्भ करते हैं।पद्म पुराणमें कल्पवास का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि संगम तट पर वास करने वाले को सदाचारी, शान्त मन वाला तथा जितेन्द्रिय होना चाहिए। संयम, अहिंसा एवं श्रद्धा ही कल्पवासका मूल है।ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, रुद्र, आदित्यतथा मरूद्गण माघ मास मेंप्रयागराजके लिएयमुनाके संगम पर गमन करते हैं। इसलिए प्रयाग में माघ मास के अन्दर तीन बार स्नान करने से जो फल होता है वह फल पृथ्वी में दस हज़ारअश्वमेध यज्ञकरने से भी प्राप्त नहीं होता है।कार्तिक मास में एक हज़ार बार गंगा स्नान करने, माघ मास में सौ बार, और बैशाख मास में नर्मदा में करोड़ बार स्नान करने से जो फल प्राप्त होता है, वह फल प्रयाग मेंकुम्भके समय पर स्नान करने मात्र से प्राप्त हो जाता है।पद्मपुराणमें माघ मास में कल्पवास के दौरान स्नान, दानऔर तप के माहात्म्य का विस्तार से वर्णन मिलता है।पद्म पुराण 5 केअध्याय 219 से 250 तकमें 2800 श्लोकों में सिर्फमाघ स्नान के माहात्म्य का ही वर्णन अंकित हैं।हेमाद्रि ग्रन्थ 5- 789- 794आदि में भी इसका विस्तृत वर्णन अंकित है।माघ के महीने में में ब्रह्मवैवर्तपुराण की कथा सुनने के महत्व का वर्णन भी मिलता है।पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार इस मास में शीतल जल के भीतर डुबकी लगाने वाले मनुष्य पापमुक्त हो स्वर्ग लोक में जाते हैं।

 

 

उल्लेखनीय है कि इस वर्ष माघ मास का प्रारंभ 29जनवरी 2021दिन शुक्रवार से हो चूका है, जो 27फरवरी 2021दिन शनिवार तक रहेगा। इस माघ के महीने में ही तिल चतुर्थी, बसंत पंचमी, रथसप्तमी, भीष्माष्टमी, मकर संक्रांति, पोंगल, लोहड़ी, मौनी अमावस्या, भीष्माष्टमी आदि महत्वपूर्ण व्रत एवं त्योहार मनाये जाते हैं।नर्मदा जयंती, माघ मेला आदि भी इसी माह आयोजित किये जाते हैं। माघ महीने की शुक्ल पंचमी सेवसंत ऋतुका प्रारम्भ होता है।माघशुक्लपक्ष की चतुर्थीउमा चतुर्थीकही जाती है।इस दिन स्त्री- पुरुषों के द्वारा कुन्द तथा कुछ अन्यान्य पुष्पों सेउमाका पूजन किये जाने का विधान है। साथ ही गुड़, लवण तथा यावक भी समर्पित किये जाते हैं। व्रती को सधवा महिलाओं, ब्राह्मणों तथा गौओं का सम्मान करना चाहिए।पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार माघ महीने के कृष्ण द्वादशी को यम ने तिलों का निर्माण किया औरदशरथने उन्हें पृथ्वी पर लाकर खेतों में बोया, तत्पश्चात देवगणों ने भगवानविष्णुको तिलों का स्वामी बनाया। इसलिए मनुष्यों को उस दिन उपवास रखकर तिलों से भगवान का पूजन कर तिलों से ही हवन औरतिलों का दान कर तिलों का ही सेवन करना चाहिए। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा का विधान है।माघ मास में तिल अवश्य खाना चाहिए। तिल सृष्टि का प्रथम अन्न है।माघ महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को माघ शुक्ल सप्तमी व्रत का अनुष्ठान अरुणोदय काल में मनुष्य को अपने सिर पर सात बदर वृक्ष के पत्ते और सात अर्क वृक्ष के पत्ते रखकर किसी सरिता अथवा स्रोत में स्नान, ध्यान दान आदि करके करना चाहिए। तत्पश्चातजल में सात बदर फल, सात अर्क के पत्ते, अक्षत, तिल, दूर्वा, चावल, चन्दन मिलाकर सूर्य को अर्ध्य देकर सप्तमी को देवी मानते हुए नमस्कार कर सूर्य को प्रणाम करना चाहिए।कतिपय पौराणिक ग्रन्थों में माघ मास में विष्णु अवतार श्रीकृष्ण की विशेष पूजा का विधान बताते हुए कहा गया है किपूरे माघ मास में भगवान श्रीकृष्ण की विधिवत पूजा- अर्चना करने से मनुष्य की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होकर सभी दुःख दूर होते हैं और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। माघ मास में श्रीकृष्ण की पूजा से पहले सुबह तिल, जल, फूल, कुश लेकर पूजन का संकल्प लेने के बाद श्रीकृष्ण की प्रार्थना और पूजा करना चाहिए। श्रीकृष्ण को घर में शुद्धतापूर्वक बने पकवानों का तुलसी के पत्ते डालकर भोग लगाना चाहिए।

 

 

माघ मास की महिमा के सम्बन्ध में एक पौराणिक कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार प्राचीन काल में नर्मदा के तट पर समस्त वेद-वेदांगों, धर्मशास्त्रों व पुराणों के ज्ञाता सुव्रत नामक एक ब्राह्मण रहते थे। बहुभाषाविद सुव्रत अनेक देशों की भाषाएं व लिपियों के ज्ञाता भी थे। अत्यंत विद्वान होते हुए भी उन्होंने अपने ज्ञान का उपयोग धर्म कार्यों में कभी नहीं किया। अपना सम्पूर्ण जीवन सिर्फ और सिर्फ धनार्जन करने में ही व्यतीत कर दिया। जब वे वृद्ध हो गए तब उन्हें अपने जीवन के कृत्यों को स्मरण करते हुए ऐसा भान हुआ कि मैंने धन तो बहुत कमाया, लेकिन परलोक सुधारने के लिए कोई काम नहीं किया। यह सोचकर वे पश्चाताप करने लगे।उसी रात चोरों ने उनके धन को चुरा लिया, लेकिन सुव्रत को इसका कोई दु:ख नहीं हुआ, क्योंकि वे तो जीवन के गूढ़ रहस्यों को जान परमात्मा को प्राप्त करने के लिए उपाय सोचमें में लग गये थे। ऐसी परिस्थिति में समस्त वेद-वेदांगों, धर्मशास्त्रों व पुराणों के ज्ञाता विद्वान सुव्रत को एक श्लोक याद आया-

माघे निमग्ना: सलिले सुशीते विमुक्तपापास्त्रिदिवं प्रयान्ति।

 

सुव्रत को अपने उद्धार का मूल मंत्र मिल गया। सुव्रत ने माघ स्नान का संकल्प लिया और नौ दिनों तक प्रात: नर्मदा के जल में स्नान किया, और दसवें दिन स्नान के बाद उन्होंने अपना प्राण त्याग दिया।सुव्रत ने जीवन भर कोई अच्छा काम नहीं किया था, लेकिन माघ मास में स्नान करके पश्चाताप करने से उनका मन निर्मल हो चुका था। जब उन्होंने अपने प्राण त्यागे तो उन्हें लेने दिव्य विमान आया और उस पर बैठकर वे स्वर्गलोक चले गए।

 

 

 माघ मास में कंबल, लाल कपड़ा, ऊन, रजाई, वस्त्र, स्वर्ण, जूता-चप्पल एवं सभी प्रकार की चादरों का दान करना उत्तम माना गया है। दान देते समय माधवः प्रियताम् अर्थात माधव अर्थात भगवान कृष्ण अनुग्रह करें, ऐसा अवश्य कहना चाहिए। माघ मास में कुछ कार्य वर्जित माने गए हैं। जैसे-स्नान करने से पूर्व तथा स्नान के बाद अग्नि सेवन वर्जित है, अर्थात आग नहीं सेंकना चाहिए। माघ मास में व्रत करने वाले लोगों के द्वारा भूमि पर शयन, प्रतिदिन हवन, हविष्य भोजन, ब्रह्मचर्य का अनिवार्यतः पालन किये जाने से मनुष्य को महान अदृष्ट फल की प्राप्ति होती है।माघ मास में मूली का सेवन मदिरा सेवन की भांति मदवर्धक माने जाने के कारण इस मास में मूली को स्वयं न तो खाना चाहिए और न ही देव अथवा पितृकार्य में उपयोग में ही लाना चाहिए।

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राजेश राय, संपादक, जनसत्ता एक्सप्रेस